सूरत में आरोपियों को सार्वजनिक रूप से पीटने के मामले में गुजरात हाईकोर्ट सख्त…
सूरत के सलाबतपुरा इलाके में 13 जुलाई 2026 को हत्या के प्रयास के मामले में गिरफ्तार किए गए पांच आरोपियों को सार्वजनिक रूप से पीटने और उनका जुलूस निकालने के आरोपों पर गुजरात हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजगी जताई है। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे थे।
आरोप है कि पुलिस ने आरोपियों को हथकड़ी लगाकर सार्वजनिक सड़क पर घुमाया और इस दौरान उन्हें थप्पड़ व डंडों से पीटा गया। वायरल वीडियो में पुलिसकर्मियों द्वारा आरोपियों के साथ मारपीट किए जाने का दावा किया गया।
मामले में अधिवक्ता उत्कर्ष दवे की ओर से गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष शिकायत की गई थी। शिकायत में आरोपियों के साथ इस तरह के व्यवहार को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन बताया गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया।
DCP राजदीपसिंह नकुम की भूमिका पर सवाल
मामले में सूरत के DCP राजदीपसिंह नकुम की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। कोर्ट में दलील दी गई कि जब किसी व्यक्ति को अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है, तब पुलिस उसे सार्वजनिक रूप से सजा या अपमानित नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि यदि संबंधित अधिकारी घटना के समय मौके पर मौजूद थे और उनकी भूमिका की जांच होनी है, तो उन्हें उसी पद पर बनाए रखने से निष्पक्ष जांच प्रभावित हो सकती है।
2022 के खेड़ा फ्लॉगिंग मामले का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान गुजरात के 2022 के खेड़ा फ्लॉगिंग मामले का भी संदर्भ आया। उस मामले में आरोपियों को सार्वजनिक रूप से बांधकर पीटने के आरोप लगे थे और बाद में पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी।
हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले में भी पुलिस के व्यवहार को गंभीरता से लेते हुए जांच की निष्पक्षता पर जोर दिया है।
हाईकोर्ट का सख्त रुख
कोर्ट का मुख्य सवाल यही है कि पुलिस कानून लागू करने वाली संस्था है, उसे किसी आरोपी को अदालत के फैसले से पहले सजा देने का अधिकार नहीं है।
मामले में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के तबादले को लेकर भी राज्य सरकार को निर्देश दिए गए हैं। अब आगे की सुनवाई और जांच में यह स्पष्ट होगा कि घटना में किन पुलिस अधिकारियों की क्या भूमिका थी और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।

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